vinod upadhyay

vinod upadhyay

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

साहब ऐसा करते क्या हैं...?

विनोद बक्सरी दिवाली से एक दिन पहले कोरियर वाला एक पैकेट मेरे बच्चे के हाथ थमा गया। अक्सर वह मेरे घर कोरियर लेकर आता रहता है। बच्चों ने उत्साह में पैकेट खोला और पूरी मीठाई खा ली। जब मैं घर पहुंचा तो उन्होंनेे खाली डिब्बा और उसमें पड़ा एक पत्र मुझे थमा दिया। अक्सर हर दिवाली पर वे ऐसा ही करते हैं। डिब्बा खाली था, इसलिए मेरा ध्यान भी सबसे पहले पत्र पर गया...पत्र में बाबू महाआरती का पाठ लिखा था...बाबू तेरी लीला अपरंपार...मेरी नैया लगाओ पार...तुमसे है डरती सरकार...तुमसे ही चलती सरकार...अब न करो इंकार ...मुझ पर करो उपकार...भेंट यह करो स्वीकार...दिवाली को रहेगा इंतजार...घर आकर पहनों नोटों का हार...अब तो दो दीदार...तुम हो मेरे परवर दीगार...मेरी नैया लगाओ पार। पत्र पढ़ते ही मैं सन्न रह गया। यह एक अटपटा अनुभव था। मुझे पत्र पढऩे के पश्चात बड़ा बच्चों पर क्रोध आया। मैंने तत्काल डिब्बे पर चढ़ा चमकिला रैपर मंगवाया...। फिर एड्रेस पढ़ थोड़ा शर्माया...उससे अधिक सकुचाया... क्योंकि यह पैकेट किसी व्यवसाई ने हमारे पड़ोस में रहने वाले एक बड़े सरकारी बाबू को भिजवाया था। अब इस समस्या को लेकर मैं अपने एक मित्र के पास गया, क्योंकि हमारे पड़ोस में रहने वाले बड़े बाबे पूरी कॉलोनी में किसी को भाव नहीं देते थे...उस पर उनके ताव भी आसमानी होते थे...। आखिर हो भी क्योंकि वे मंत्रालय में ओहदेदार थे...उनका रसूख रात को दिखता था...जब उनके मकान में महंगी कार वालों की पंचायत लगती थी। बड़े बाबू के इस रसूख को देखकर मेरी पत्नी मुझे कोसती थी...लेकिन उसे संतोष इस बात का था कि मैं घर पर दफ्तर का काम तो नहीं करता था। दरअसल, बड़े बाबू की पत्नी मोहल्ले की महिलाओं को बताती रहती थी कि उनके ऊपर काम का इतना बोझ है कि अक्सर उन्हें घर पर भी काम करना पड़ता है। हम भी बड़े बाबू को गर्व से देखते थे... और उनकी कर्मठता के उदाहरण दिया करते थे...। लेकिन जबसे मैंने उनके नाम आया पत्र पढ़ा है तब से हैरत भी हुई कि एक बाबू भला भगवान का दर्जा कैसे प्राप्त कर सकता है! मित्र ने तर्क दिया कि लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए लक्ष्मी पूजन करते हैं लेकिन असल में लक्ष्मी के द्वार बाबू ही खोलता है। यह आरती व्यापारियों के लिए अति लाभकारी है, जिनका पाला रोजाना बाबुओं से पड़ता है। यह आरती खासतौर पर बड़े बाबू के लिए तैयार की है। बड़े बाबू सारे बाबुओं का निचोड़ है, कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनमें नेताओं के सारे गुण विद्यमान हैं सिवा इसके कि नेता एक पल के लिए कुर्सी छोडऩा नहीं चाहता और बड़े बाबू कुर्सी पर टिकते नहीं हैं। उनकी शाही सवारी तकरीबन साढ़े ग्यारह बजे ऑफिस पहुंचती है। आसन ग्रहण करने के साथ ही चाय पीने-पिलाने में व्यस्त हो जाते है...फिर जैसे ही डेढ़ बजता है वे लंच के लिए निकल जाते हैं। मन हुआ तो चार बजे तक ऑफिस पहुंचते हैं...वर्ना अक्सर तो गायब ही रहते हैं। मित्र की बातें सुनकर मैं हैरान रह गया...। अक्सर जिस तरह के सवाल पूछे जाते हैं मैंने भी मित्र से पूछ लिया...बड़े बाबू को वेतन कितना मिलता होगा? दोस्त बोला...तीन-चार लाख आराम से।... मैं आवाक रह गया...मेरे मन में सवाल उठा आखिर ये ऐसा क्या करते होंगे...वह भी तीन-चार घंटे की ड्यूटी में? मैंने दोस्त से अपने सवाल का जवाब पूछा, तो वह बोला...सरकारी कर्मचारियों को इनकम टैक्स में स्टैंडर्ड डिडक्शन की भांति कार्य अवधि में शुरू के आधे घंटे की छूट प्रदत्त है। आधा घंटा कर्मचारी आदतन झटक लेता है। इससे अधिक देरी होने पर रामबाण की तरह अचूक बहाने हाजिर हैं, मसलन किसी की डेथ हो गई, तीसरे में जाना है, उठावने में शरीक होना है। ट्रेन लेट थी, बस छूट गई, गाड़ी पंक्चर हो गई, अचानक मेहमान आ धमके, तबीयत बिगड़ गई वगैरह-वगैरह। इतना किसी की बोलती बंद करने के लिए काफी है। बड़े बाबू इस मामले में खुशनसीब हैं, उन्हें देरी से आने पर किसी बहाने की जरूरत नहीं पड़ती। कई मंत्री और मुख्य सचिव आए...कासदे बनाए...चले गए। किसी ने भी उनकी शान में खलल डालने की गुस्ताखी नहीं की। बाबूगिरी का लोहा, सरकार भी मानती है। सरकार के आला अफसर उनके आगे नतमस्तक हैं और जनता साष्टांग दंडवत। किसी सरकारी दफ्तर के दिनभर के कामकाज का अवलोकन करें तो कार्य की शुरुआत सुबह की चाय के पश्चात होती है। एकाध घंटे बाद पेट में चूहे कूदने लगते हैं। कहने को मध्यांतर अर्थात लंच ब्रेक आधे घंटे का होता है, लेकिन कर्मचारी डेढ़ घंटे की अंगरेजी फिल्म पूरी करके ही ऑफिस लौटता है। आते ही चाय की तलब शुरू होती है। यह एक संक्रमण की बीमारी है। अपने साथ चार अन्य को चपेट में ले लेती है। पांच बजे नहीं कि घर की याद सताने लगती है। नजरें घड़ी के कांटों पर जैसे जम जाती हैं। मित्र की पूरी बात सुनने के बाद मेरी समझ में यह बात आई की, अफसरों को भारी-भरकम पैकेज के बजाए छोटा पेक अधिक प्रोत्साहित करता है। भेंट संस्कृति सरकारी तंत्र का अहम हिस्सा है जो उसकी क्षमता को बढ़ाता है। सरकारी दफ्तर एक मंदिर है, जहां कलयुग के भगवान विराजते हैं जो बगैर दान-दक्षिणा के प्रसन्न नहीं होते। चढ़ावा भले ही कानून संगत नहीं होता, लेकिन तर्कसंगत होता है और व्यावहारिक भी। चढ़ावा काम पूरा होने की गारंटी है। जब भक्त की मुराद पूरी हो रही हो तो भला वह कैसे प्रभु को नाराज कर सकता है? हैरानी की बात तो यह है कि सरकार भी बाबूगीरी के आगे पस्त है...तभी तो उन्हें मक्कारी करने के लिए पांचवा, छठा या सातवां वेतनमान भी दिया जा रहा है। मित्र का मानना है कि नौकरी सरकारी बेस्ट होती है उसके तीन कारण वे गिनाते हैं - पहला तो यही कि आप सरकारी हुए और जमाना आपको बाकायदा सरकारी दामाद मानने लगेगा। व्यावहारिक तौर पर देखें तो सरकार का दामाद सरकार से बड़ा होता है। वैसे तो इतना भी काफी है, लेकिन मौका पड़ते ही सरकार आप खुद भी बन सकते हैं। दूसरा जब आज के समय में आप सरकार हैं तो नामालूम राजे रजवाड़ों से बाकायदा ऊपर हैं जिनका कि प्रिवीपर्स भी बंद हो चुका है। आम आदमी तो आपके लिए चिकन-चूजों से ज्यादा नहीं। यह एक दैवीय अहसास है, इसी को सत्ता-सुख कहते हैं, नेताओं को पांच साल के लिए नसीब होता है, लेकिन आपको जिंदगी भर के लिए। तीसरा, पकड़े जाने पर सरकारी भृत्य के यहां भी करोड़ों की अघोषित संपत्ती मिलती है। इससे नहीं पकड़े गए अफसरों के सम्मान में इतना इजाफा हो जाता है कि उनकी छाती में दस से पंद्रह इंच की वृद्घि हो जाती है। कल ही एक बड़े साहब रिटायर हुए हैं, आज वे मित्रों के बीच बैठे नए नए किस्से सुना रहे हैं मानो जंगल से लौट कर शिकारी बता रहा है कि उसने कैसे कैसे शेर और हिरण मारे। साथ में ये भी बोले रहे हैं कि भईया काजल की कोठरी से बेदाग निकल आए हैं। उनका मतलब है कि पकड़े नहीं गए हैं। भ्रष्ट वही है जो पकड़ा जाए। जो पकड़ा नहीं गया वो देश सेवक है। आइए हम सब देश सेवक बाबूओं के लिए ताली बजाएं।

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