विनोद बक्सरी/ vinod buxari






लोग गलत कहते हैं कि महंगाई डायन है। डायन महंगाई नहीं, डायन तो व्यवस्था है, जो इत्ता खाकर भी हर वक्त और खाने की इच्छा रखती है। बेचारी महंगाई को दोष देने से क्या हासिल? न अपने चाहे से वो बढ़ती है, न अपने चाहे से वो घटती। जैसा नेता-सत्ता-व्यवस्था उसे चलाते हैं, वो चलती है। इसीलिए तो महंगाई की चाल को मस्ती की चाल कहा जाता है।
सच बोलूं, अब तो महंगाई का मसला मुझे भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी बौराए टाइप लगने लगा है। महंगाई को लेकर चाहे जित्ता नेताओं को गरिया लो, चाहे जित्ता व्यवस्था को कोस लो, चाहे जित्ता जमाखारों को लतिया लो पर महंगाई की सेहत पर कहीं कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वो अपनी ही गति से मस्त घटती-बढ़ती रहती है। सरकारें आती हैं, जाती हैं किंतु महंगाई का मसला जस का तस बना रहता है।
दरअसल, पिछली सरकार ने आम आदमी को महंगाई की खूब प्रैक्टिस करवाई थी। महंगाई के चलते आम आदमी को हर हाल में जीना-रहना बताया था। उसे इत्ता मजबूर कर दिया था कि वो अपनी जरूरत का सामान बिन खरीदे रह ही न सके। सो, तब से लेकर अब तक आम आदमी महंगाई के भिन्न-भिन्न रूपों को अलग-अलग तरीके से झेल रहा है। महंगाई अब उसकी आदत बन चुकी है। 100 रुपए किलो दाल या 80 रुपए किलो प्याज के बिकने से उसकी सेहत पर ज्यादा कुछ असर नहीं पड़ता। पेट की आग को शांत करने के लिए, ठंडा पानी तो पीना ही पड़ेगा न। है कि नहीं...।
मैं तो कतई इस फेवर नहीं हूं कि महंगाई पर किसी प्रकार की चिंता-विंता करनी चाहिए। या महंगाई के लिए सरकारों या नेताओं को गरियाना चाहिए। इत्ती-सी बात हम नहीं समझ पाते कि उम्र की तरह महंगाई का काम भी बढऩा है। जैसे बढ़ती उम्र को घटाया नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह बढ़ती महंगाई को भी नहीं घटाया जा सकता। हां, कुछ उत्पादों पर फौरी तौर पर रिलेक्सेशन जरूर दिया जा सकता है किंतु एकदम से महंगाई को खत्म नहीं किया जा सकता। महंगाई का बढऩा समय का शाश्वत सत्य है।
बाजारों में बढ़ती भीड़ को देखकर कभी मुझे लगा ही नहीं कि महंगाई है! लोग खरीददारी पर खरीददारी किए चले जा रहे हैं। एक-एक दुकान पर इत्ती-इत्ती भीड़ है कि पैर रखना तक मुश्किल। सड़कों पर पैदल चलना तक मुहाल है। लोग जित्ता दुकान के अंदर से खरीद रहे हैं, उत्ता ही बाहर (फड़-ठेलों) से भी। हां, खरीददारों की हैसियत जरूर अलग-अलग हो सकती है लेकिन बाजारों में भयंकर खरीददारी जारी है।
जमाना बदला है। अब आदमी की जरूरत केवल रोटी-कपड़ा-मकान नहीं रह गई है। आदमी जरूरत में अब कार, मोबाइल और मनोरंजन भी शामिल हो गया है। दाल-रोटी खरीदने वाला आम आदमी कपड़े और मोबाइल भी उसी चाव से खरीदता है। मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के बीच च्परचेसिंग सेंसज् बेइंतहा बढ़ा है। पहले घरों में साईकिल रेयर मानी जाती थी, अब तो महंगी से महंगी कार तक रेयर न रही। हर दूसरे घर में फर्स्ट या सेकेंड कार मिल ही जाएगी। फिर भी रोने वाले रोते हैं कि हाय! महंगाई बहुत है। अगर महंगाई है तो बाजारों में इत्ती भीड़ क्यों हैं प्यारे?
गजब यह है कि महंगाई पर सियापा करते वक्त हम लोगों की बढ़ती सैलरी का रेशो नहीं देखते। महंगाई अगर बढ़ी है तो सैलरियों में भी तो इजाफा हुआ है। समाज में 100 रुपए किलो दाल खरीदने वाले भी हैं और 10 हजार का स्मार्टफोन खरीदने वाले भी। बाजारों में सबकुछ बिक रहा है। चाहे महंगाई हो या न हो। यहां तो ऐसे लोग भी हैं, जो 60 हजार का आईफोन एक झटके में खरीद लेते हैं। फिर बताओ प्यारे, कहां है महंगाई?
महंगाई के बढऩे को जिसने दिल पर लिया, वो अवसाद में डूबता चला गया। अमां, अवसाद में जाने की यहां और भी वजहें मौजूद हैं, केवल महंगाई को लेकर अवसाद में जाना स्मार्टनेस नहीं। महंगाई है तो कम खाइए या कम में गुजारा कीजिए। क्या जरूरी है, महंगाई के लिए हर वक्त रोना ही रोया जाए?
देखो जी, महंगाई न किसी के रोने से रुकने वाली है, न किसी के सड़कों पर चीखने-चिल्लाने से। उसका काम है बढऩा है, वो बढ़ेगी ही। सरकारें आएंगी जाएंगी किंतु महंगाई को अपनी चाल चलना है वो अनवरत चलती ही रहेगी। खामखा, सरकारों और नेताओं को महंगाई के वास्ते गरियाकर अपनी जुबान को मैला करना। जस्ट चिल्ल डूड।
मेरी मानिए, महंगाई को अपना दोस्त बना लीजिए। उसके साथ गलबहियां कीजिए। महंगाई के घटने-बढऩे को मनोरंजन का साधन बनाइए। फिर देखिएगा महंगाई कभी चिंता का कारण नहीं बनेगी। चिंता का रास्ता चिता तक लेकर जाता है, इत्ता ध्यान रखें। महंगाई पर खाक डालिए। क्योंकि और भी गम हैं दुनिया में महंगाई के सिवा।
आम आदमी की मानिंद पहले मैं भी महंगाई के मसले को लेकर खासा परेशान रहता था। हर समय सरकार और नेताओं को कोसता रहता था। मगर फर्क फिर भी किसी की सेहत पर कोई नहीं पड़ता था। सब अपनी-अपनी में मस्त रहकर जिंदगी का मजा लेते रहते थे। फिर धीरे-धीरे कर मैंने भी नेताओं और सरकारों को कोसना बंद कर दिया। अपने तरीके से बढ़ती महंगाई को एंजॉय करने लगा। यों, कुढ़ते रहने से तो बेहतर है कि महंगाई को एंजॉय ही किया जाए। खामखा अपना दिमाग और जुबान खराब करने से क्या हासिल प्यारे। अब तो अगर महंगाई बढ़ती भी तो भी मैं किसी को नहीं गरियाता। महंगाई को मस्ती के साथ एंजॉय करता हूं। 100 रुपए किलो की दाल और 80 रुपए किलो का प्याज खरीदकर लंबी तानकर सोता हूं। जब नेताओं-सरकारों को मेरी फिकर नहीं तो भला मैं क्यों करूं? मस्त रहो। एंजॉय करो। महंगाई को अपनी चाल चलने दो, जैसे अक्सर सेंसेक्स चला करता है।

मेरी बात मानिए, महंगाई की चिंता करना छोड़ ही दीजिए। महंगाई को अपने हाल पर खुश रहने दें और हम-आप अपने हाल पर खुश रहें। इसी में समझदारी है। बाकी आपकी मर्जी।
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