vinod upadhyay

vinod upadhyay

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

साहब ऐसा करते क्या हैं...?

विनोद बक्सरी दिवाली से एक दिन पहले कोरियर वाला एक पैकेट मेरे बच्चे के हाथ थमा गया। अक्सर वह मेरे घर कोरियर लेकर आता रहता है। बच्चों ने उत्साह में पैकेट खोला और पूरी मीठाई खा ली। जब मैं घर पहुंचा तो उन्होंनेे खाली डिब्बा और उसमें पड़ा एक पत्र मुझे थमा दिया। अक्सर हर दिवाली पर वे ऐसा ही करते हैं। डिब्बा खाली था, इसलिए मेरा ध्यान भी सबसे पहले पत्र पर गया...पत्र में बाबू महाआरती का पाठ लिखा था...बाबू तेरी लीला अपरंपार...मेरी नैया लगाओ पार...तुमसे है डरती सरकार...तुमसे ही चलती सरकार...अब न करो इंकार ...मुझ पर करो उपकार...भेंट यह करो स्वीकार...दिवाली को रहेगा इंतजार...घर आकर पहनों नोटों का हार...अब तो दो दीदार...तुम हो मेरे परवर दीगार...मेरी नैया लगाओ पार। पत्र पढ़ते ही मैं सन्न रह गया। यह एक अटपटा अनुभव था। मुझे पत्र पढऩे के पश्चात बड़ा बच्चों पर क्रोध आया। मैंने तत्काल डिब्बे पर चढ़ा चमकिला रैपर मंगवाया...। फिर एड्रेस पढ़ थोड़ा शर्माया...उससे अधिक सकुचाया... क्योंकि यह पैकेट किसी व्यवसाई ने हमारे पड़ोस में रहने वाले एक बड़े सरकारी बाबू को भिजवाया था। अब इस समस्या को लेकर मैं अपने एक मित्र के पास गया, क्योंकि हमारे पड़ोस में रहने वाले बड़े बाबे पूरी कॉलोनी में किसी को भाव नहीं देते थे...उस पर उनके ताव भी आसमानी होते थे...। आखिर हो भी क्योंकि वे मंत्रालय में ओहदेदार थे...उनका रसूख रात को दिखता था...जब उनके मकान में महंगी कार वालों की पंचायत लगती थी। बड़े बाबू के इस रसूख को देखकर मेरी पत्नी मुझे कोसती थी...लेकिन उसे संतोष इस बात का था कि मैं घर पर दफ्तर का काम तो नहीं करता था। दरअसल, बड़े बाबू की पत्नी मोहल्ले की महिलाओं को बताती रहती थी कि उनके ऊपर काम का इतना बोझ है कि अक्सर उन्हें घर पर भी काम करना पड़ता है। हम भी बड़े बाबू को गर्व से देखते थे... और उनकी कर्मठता के उदाहरण दिया करते थे...। लेकिन जबसे मैंने उनके नाम आया पत्र पढ़ा है तब से हैरत भी हुई कि एक बाबू भला भगवान का दर्जा कैसे प्राप्त कर सकता है! मित्र ने तर्क दिया कि लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए लक्ष्मी पूजन करते हैं लेकिन असल में लक्ष्मी के द्वार बाबू ही खोलता है। यह आरती व्यापारियों के लिए अति लाभकारी है, जिनका पाला रोजाना बाबुओं से पड़ता है। यह आरती खासतौर पर बड़े बाबू के लिए तैयार की है। बड़े बाबू सारे बाबुओं का निचोड़ है, कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनमें नेताओं के सारे गुण विद्यमान हैं सिवा इसके कि नेता एक पल के लिए कुर्सी छोडऩा नहीं चाहता और बड़े बाबू कुर्सी पर टिकते नहीं हैं। उनकी शाही सवारी तकरीबन साढ़े ग्यारह बजे ऑफिस पहुंचती है। आसन ग्रहण करने के साथ ही चाय पीने-पिलाने में व्यस्त हो जाते है...फिर जैसे ही डेढ़ बजता है वे लंच के लिए निकल जाते हैं। मन हुआ तो चार बजे तक ऑफिस पहुंचते हैं...वर्ना अक्सर तो गायब ही रहते हैं। मित्र की बातें सुनकर मैं हैरान रह गया...। अक्सर जिस तरह के सवाल पूछे जाते हैं मैंने भी मित्र से पूछ लिया...बड़े बाबू को वेतन कितना मिलता होगा? दोस्त बोला...तीन-चार लाख आराम से।... मैं आवाक रह गया...मेरे मन में सवाल उठा आखिर ये ऐसा क्या करते होंगे...वह भी तीन-चार घंटे की ड्यूटी में? मैंने दोस्त से अपने सवाल का जवाब पूछा, तो वह बोला...सरकारी कर्मचारियों को इनकम टैक्स में स्टैंडर्ड डिडक्शन की भांति कार्य अवधि में शुरू के आधे घंटे की छूट प्रदत्त है। आधा घंटा कर्मचारी आदतन झटक लेता है। इससे अधिक देरी होने पर रामबाण की तरह अचूक बहाने हाजिर हैं, मसलन किसी की डेथ हो गई, तीसरे में जाना है, उठावने में शरीक होना है। ट्रेन लेट थी, बस छूट गई, गाड़ी पंक्चर हो गई, अचानक मेहमान आ धमके, तबीयत बिगड़ गई वगैरह-वगैरह। इतना किसी की बोलती बंद करने के लिए काफी है। बड़े बाबू इस मामले में खुशनसीब हैं, उन्हें देरी से आने पर किसी बहाने की जरूरत नहीं पड़ती। कई मंत्री और मुख्य सचिव आए...कासदे बनाए...चले गए। किसी ने भी उनकी शान में खलल डालने की गुस्ताखी नहीं की। बाबूगिरी का लोहा, सरकार भी मानती है। सरकार के आला अफसर उनके आगे नतमस्तक हैं और जनता साष्टांग दंडवत। किसी सरकारी दफ्तर के दिनभर के कामकाज का अवलोकन करें तो कार्य की शुरुआत सुबह की चाय के पश्चात होती है। एकाध घंटे बाद पेट में चूहे कूदने लगते हैं। कहने को मध्यांतर अर्थात लंच ब्रेक आधे घंटे का होता है, लेकिन कर्मचारी डेढ़ घंटे की अंगरेजी फिल्म पूरी करके ही ऑफिस लौटता है। आते ही चाय की तलब शुरू होती है। यह एक संक्रमण की बीमारी है। अपने साथ चार अन्य को चपेट में ले लेती है। पांच बजे नहीं कि घर की याद सताने लगती है। नजरें घड़ी के कांटों पर जैसे जम जाती हैं। मित्र की पूरी बात सुनने के बाद मेरी समझ में यह बात आई की, अफसरों को भारी-भरकम पैकेज के बजाए छोटा पेक अधिक प्रोत्साहित करता है। भेंट संस्कृति सरकारी तंत्र का अहम हिस्सा है जो उसकी क्षमता को बढ़ाता है। सरकारी दफ्तर एक मंदिर है, जहां कलयुग के भगवान विराजते हैं जो बगैर दान-दक्षिणा के प्रसन्न नहीं होते। चढ़ावा भले ही कानून संगत नहीं होता, लेकिन तर्कसंगत होता है और व्यावहारिक भी। चढ़ावा काम पूरा होने की गारंटी है। जब भक्त की मुराद पूरी हो रही हो तो भला वह कैसे प्रभु को नाराज कर सकता है? हैरानी की बात तो यह है कि सरकार भी बाबूगीरी के आगे पस्त है...तभी तो उन्हें मक्कारी करने के लिए पांचवा, छठा या सातवां वेतनमान भी दिया जा रहा है। मित्र का मानना है कि नौकरी सरकारी बेस्ट होती है उसके तीन कारण वे गिनाते हैं - पहला तो यही कि आप सरकारी हुए और जमाना आपको बाकायदा सरकारी दामाद मानने लगेगा। व्यावहारिक तौर पर देखें तो सरकार का दामाद सरकार से बड़ा होता है। वैसे तो इतना भी काफी है, लेकिन मौका पड़ते ही सरकार आप खुद भी बन सकते हैं। दूसरा जब आज के समय में आप सरकार हैं तो नामालूम राजे रजवाड़ों से बाकायदा ऊपर हैं जिनका कि प्रिवीपर्स भी बंद हो चुका है। आम आदमी तो आपके लिए चिकन-चूजों से ज्यादा नहीं। यह एक दैवीय अहसास है, इसी को सत्ता-सुख कहते हैं, नेताओं को पांच साल के लिए नसीब होता है, लेकिन आपको जिंदगी भर के लिए। तीसरा, पकड़े जाने पर सरकारी भृत्य के यहां भी करोड़ों की अघोषित संपत्ती मिलती है। इससे नहीं पकड़े गए अफसरों के सम्मान में इतना इजाफा हो जाता है कि उनकी छाती में दस से पंद्रह इंच की वृद्घि हो जाती है। कल ही एक बड़े साहब रिटायर हुए हैं, आज वे मित्रों के बीच बैठे नए नए किस्से सुना रहे हैं मानो जंगल से लौट कर शिकारी बता रहा है कि उसने कैसे कैसे शेर और हिरण मारे। साथ में ये भी बोले रहे हैं कि भईया काजल की कोठरी से बेदाग निकल आए हैं। उनका मतलब है कि पकड़े नहीं गए हैं। भ्रष्ट वही है जो पकड़ा जाए। जो पकड़ा नहीं गया वो देश सेवक है। आइए हम सब देश सेवक बाबूओं के लिए ताली बजाएं।

भला क्यों लौटाऊं पुरस्कार?

विनोद बक्सरी
लेखन में मुझे अभी तलक कोई बड़ा-छोटा पुरस्कार नहीं मिला है। हां, बचपन में एक पुरस्कार पतंगबाजी में अवश्य मिला था। पुरस्कारों के नाम पर एक अकेला वही पुरस्कार मेरे कने है। लेखन में पुरस्कार लेने की न कभी जरूरत महसूस हुई, न ही किसी ने देने का वायदा किया। पतंगबाजी में पाए पुरस्कार को लेकर अब मुझे हर वक्त डर-सा लगा रहता है। डर इसलिए रहता है- कहीं कोई घर पर न आ धमके और बोले- अपना पुरस्कार लौटाओ। हालांकि वो ऐसा कोई बड़ा या महान पुरस्कार नहीं है, फिर भी, पुरस्कार तो है ही। यों भी, पुरस्कार न छोटा होता है न बड़ा। पुरस्कार पुरस्कार होता है। और, मैं अपना यह पुरस्कार किसी कीमत पर नहीं लौटा सकता। न केवल इस पुरस्कार बल्कि पतंगबाजी में मेरी जान बसती है। मैं एक बार को लिखना छोड़ सकता हूं किंतु पतंगबाजी हरगिज नहीं। दो-चार रोज पहले पत्नी ने मुझे राय दी थी कि तुम्हारे पास पुरस्कारों के नाम जो अकेला पुरस्कार है उसे लौटा दो। भगवान कसम, रोतों-रात सेलिब्रिटी बन जाओगे। रिश्तेदारों के लेकर मीडिया तक में तुम्हारी पूछम-पूछ बढ़ जाएगी। जैसे- अन्य बड़े लेखक लोग अपने-अपने सम्मान-पुरस्कार वासप कर रहे हैं, तुम भी कर दो। वैसे भी, इस पुरस्कार में अब रखा ही क्या है! पत्नी की लघु राय को सुनने के बाद मैंने बेहद सहज भाषा में उससे कहा- देखो यार, पुरस्कार तो मैं लौटाने से रहा। चाहे इस बात पर तुम मेरा घर में हुक्का-पानी ही क्यों न बंद कर दो। इत्ती मेहनत करके तो एक अदद पुरस्कार हत्थे आया था, उसे भी एंवई लौटा दूं। अमां, पुरस्कार कोई लौटाने के लिए थोड़े न लिए जाते हैं। कि, जब मन में आया पुरस्कार ले लिया, जब दिल न ठुका लौटा दिया। न न मैं इस पुरस्कार को नहीं लौटाऊंगा। जो लौटा रहे हैं, उनकी वे जानें। मैं बे-सेलिब्रिटी बने ही ठीक हूं। इत्ती सुनने के बाद पत्नी खासा लाल-पीली थी मुझ पर। बोली- तुममें मौका देखकर चौका मारने का कोई गुण नहीं है। जैसा ठस्स तुम्हारा लेखन है, वैसे ही तुम भी। यहां तमाम लेखक-साहित्यकार लोग बहती गंगा में हाथ धोने में लगे हैं और तुम हो कि आदर्शवाद का बैंड बजा रहे हो। अजी, बीत लिए दिन आदर्शवाद के; लेखन में भी और जीवन में भी। अब तो वही महान है, जो मौकापरस्त और समझौतावादी है। इत्ती जान-पहचान तो इन लेखकों को पुरस्कार मिलते वक्त न मिली होगी, जो आज लौटाते हुए मिल रही है। सलमान खान से बड़े हीरो हो लिए हैं सब के सब। मैंने पत्नी को पुन: समझाया। देखो डार्लिंग- ये सब लेखकों की महज स्टंटबाजी है। सत्ता बदली है तो पेट में मरोड़े उठना लाजिमी है। दर्द कहीं न कहीं से तो बाहर आएगा ही। सो, पुरस्कार ही लौटाए दे रहे हैं। लेकिन खुलकर एक भी बंदा पुरस्कार पाने के लिए की गईं किस्म-किस्म की जुगाड़बाजियों पर कोई बात न कर रहा। अगर लौटाना ही था तो लिया ही क्यों था? तरह-तरह के फासीवाद का हवाला न दीजिए, ये तो यहां किसी न किसी रूप में बरसों से मौजूद है। मुझे मालूम था, पत्नी अब तक पक चुकी थी, मेरी बकबास को सुनकर। इसलिए उसने बहस से कट लेना ही उचित समझा। मगर हां जाते-जाते मुझे ये श्राप जरूर दे गई, भगवान करे तुम्हें कोई पुरस्कार न मिले। वाकई, मैं चाहता भी यही हूं कि मुझे कोई पुरस्कार न मिले। पुरस्कार मिले के तमाम झंझट हैं। अगर बात लौटाने की आ जाए, तो झंझट ही झंझट। पुरस्कार एक तरह से प्रेमिका जैसे होते हैं कि छोडऩे का दिल ही नहीं करता। तब ही तो मैं अपना पतंगबाजी वाला पुरस्कार नहीं लौटा रहा। लौटाकर जरा-बहुत कमाई इज्जत का फलूदा थोड़े न बनवाना है मुझे। एटिट्यूड में आकर जो लौटा रहे हैं, उन्हें मीडिया के बीच भाव भी अच्छे खासे मिल रहे हैं। बैठे-ठाले अगर कुछ मिल जाए, तो सोने पे सुहागा। उम्मीद है, अब से आगे आने वाली पीढ़ी भी शायद यही मानकर चलेगी कि पुरस्कार लौटाकर ही दुनिया में महान बना जा सकता है! 999999999999999999 ऊपर वाले का रहम है, जो मुझे आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। मिल गया होता तो आज मेरी गर्दन एहसानों तले झुकी और जबान शुक्रिया कहते-कहते घिस गई होती। हालांकि ऐसा कोई मानेगा नहीं परंतु सत्य ये है कि पुरस्कार लेना या मिलना दोनों की स्थितियों में लेखक के लिए खतरे समान होता है। जी हां, पुरस्कार किसी भीषण खतरे से कम नहीं होते। पुरस्कार पाने के लिए किस-किस प्रकार की तिकड़में भिड़ानी पड़ती हैं, यह सबको मालूम है। गिरी चीज को उठाने में लेखक को जित्ती कमर नहीं झुकानी पड़ती, उससे कहीं ज्यादा पुरस्कार पाने के लिए झुकानी होती है। कुछ लेखक तो इत्ता पुरस्कार प्रेमी होते हैं कि पुरस्कार मिल जाने के बाद नेताओं के कदमों में यों गिर पड़ते हैं मानो उनका अभूतपूर्व एहसान जतला रहे हों। यह दीगर बात है, पुरस्कार पाने के बाद लौटाने की धमकी देना सबसे क्रांतिकारी कदम है। इस क्रांतिकारी कदम को उठाने में किसी दल या नेता की सहमति नहीं लेनी होती, बस एक लाइन बोलनी भर होती है- मैं फलां-फलां पुरस्कार लौटा रहा हूं। इत्ते में ही लेखक हिट हो लेता है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों-चौराहों तक पर उसके नामों के चर्चे गुंजने लगते हैं। जाने कहां-कहां से मीडिया वाले उसका साक्षात्कार लेने पहुंच जाते हैं।

दाल-रोटी नहीं पिज्जा-बर्गर खाओं...

विनोद बक्सरी vinod buxari
किसी ने कहा था-दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। लेकिन साब अब तो अपन बड़े कन्फ्यूजन के दौर से गुजर रहे हैं। कन्फ्यूजन इस बात का है साब कि दाल तो ऐसी हो गई है जो अब गलती नहीं या यूं भी कह सकते हैं की मिलती नहीं। इसकी भी चिंता नहीं है। भई, इस जमाने में भला दाल-रोटी अकेले से पेट भरता है क्या। आजकल पेट पिज्जा, बर्गर चायनीज जैसे भोज्य उत्पादों से भरता है। ये गांधी युग नहीं बल्कि इक्कसवीं सदी है। इसलिए तो दाल-रोटी जैसी रेसिपी पुरातन हो गयी है। अब अगर दाल 50 रूपए किला बिके या 200 रूपए किलो, अपना क्या जाा हैै? दाल महंगी होने से अब तो कूकर और फ्राइंग पैन की जरूरत ही नहीं महसूस होती। सरकार ने हमें दाल खरीदने के झंझट से बरी जो कर दिया है। साब आधुनिक रेसिपी के आगे दाल-रोटी स्वयं कन्फ्यूज है कि उसके गांधी वाले दिनों का क्या होगा। अब देखो न हमारे सयाने भी दाल-रोटी मात्र से कतराने लगे हैं। कहते हैं देश में चल रहे इत्ते बवालों के बीच तुम लोग महंगाई और दाल पर ही ध्यान लगाए हो। उनका भी कहना ठीक ही है। अगर हम दाल और प्याज पर ध्यान न दें तो सोने पर सुहागा ही है। क्लियर कर दूं, यहां हम से मतलब जनता से है, नेता से नहीं। नेता लोग तो फिलहाल बिहार चुनाव और गाय-बीफ की जंग में ही उलझे हुए हैं। उनके लिए महंगाई का बढऩा या दाल का 200 रुपए किलो बिकना अभी उत्ती बड़ी चिंता का विषय नहीं है। हालांकि दाल का 200 रुपए किलो बिकना चिंता का विषय तो हमारे लिए भी नहीं है। पर क्या करें, चिंता करने के वास्ते हमारे कने भी तो कुछ होना चाहिए कि नहीं! महंगाई और दाल क्या बुरी हैं। यों, चिंता करने में कुछ जाता भी नहीं। बस, दिल को तसल्ली और दिमाग को काम मिल जाता है। पिछली सरकार में तो हम दाल से लेकर आटे तक के दर्द को झेल चुके हैं। तब तो हम इत्ती चिंता किया करते थे कि दिन के चौबीस में से साढ़े तेईस घंटे तो चिंता व्यक्त करने में ही फना हो जाया करते थे। फिलहाल, सरकार बदल जरूर गई है पर महंगाई पर चिंता करने की हमारी आदत कतई न बदली है। अब हम महंगाई के साथ-साथ सामाजिक ताने-बाने के सहिष्णु रहने की भी चिंता करने लगे हैं। क्या करें, दाल से लेकर समाज तक की जिम्मेवारी हम पर भी तो है। बिचारे नेता-मंत्री लोग क्या-क्या देखेंगे? किस-किस की चिंता करेंगे? उन्हें अपने ही इत्ते काम रहते हैं, महंगाई और दाल की सामाजिक स्थिति क्या है, देख नहीं पाते। सौ बातों की एक बात है प्यारे, दाल चाहे 200 रुपए किलो बिके या 500 रुपए अंतत: गलानी हमें (जनता) को ही है। नेता लोगों की दाल तो खुद-ब-खुद गल जाती है। अगर न भी गले तो कौन-सा उनकी तंददुरुस्त पर खास फर्क पडऩे वाला है। लेकिन शबाश है, वो जनता जो 200 रुपए किलो की दाल को भी गला लेती है। मेरी विचार में, एक नोबेल तो उन्हें भी बनता है, जो इत्ती महंगी दाल को गलाने की क्षमता रखते हैं। अरे आस-पड़ोस में क्या झांकना, मुझे ही देखिए लीजिए, जाने कब से प्लानिंग कर रहा हूं, 200 रुपए किलो की दाल को खरीदने की लेकिन नहीं खरीद पा रहा। कोई न कोई अड़चन ससुरी बीच में आ ही जाती है। कभी जेब में दौ सौ रुपए भी नहीं होते, जब होते हैं, तो दवा-दारू में खर्च हो लेते हैं। ऊधर, पत्नी 200 रुपए किलो दाल के वास्ते मेरी हैसियत को ही चुनौती देती रहती है। कहती है, लेखक तो तुम इत्ते बड़े हो लेकिन हैसियत तुम्हारी दो कौड़ी की भी नहीं। मात्र 200 रुपए किलो की दाल नहीं खरीद सकते, हार क्या खाक खरीदकर पाओगे। तुमसे कहीं अच्छा तो पड़ोस का मंगू है। चाट का ठेला भले ही लगाता है पर दाल और हार खरीदने में कतई कोताही नहीं बरत्ता। मैं फिर कह रही हूं, लेखन को छोड़कर तुम भी ठेला लगाना शुरू कर दो। कम से कम चार पैसे घर में तो आएंगे। न ही दाल के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ेगा। पत्नी का क्या है, कुछ भी बोल देती है। दाल-आटे-हार का हिसाब-किताब रखना तो मुझे ही होता है। फिर भी, कभी-कभी मुझे अपने लेखक होने पर अफसोस भी होता है कि बताओ 200 रुपए किलो की दाल को खरीदने में मुझे इत्ता सोचना पड़ रहा है। अभी नेता होता तो न सोचना पड़ता, न पत्नी की सुननी पड़ती। दाल गलती सो अलग। इत्ती महंगी दाल मुझसे तो गलने से रही। एकाध दिन की बात होती तो चल भी जाता। यह तो रोज की बात है। दाल पर चिंता व्यक्त करने के अतिरिक्त मैं कुछ नहीं कर सकता। चिंता करने से दिल को कुछ तो सुकून मिलता है। ये ही सही।

मलेरिया बाबू को मच्छरों का सलाम!

विनोद बक्सरी / vinod buxari हमारा देश वीरों-बलिदानियों, दानियों और दयावानों की भूमि रही है। आज के दौर में वीर, बलिदानी और दानी तो ढंूढे भी नहीं मिलते हैं लेकिन दयावान तो मिल ही जाते हैं। ऐसे ही एक दयावान इनदिनों हमारे प्रदेश में खूब चर्चा में हैं। वो हैं मलेरिया बाबू। जी, यह इनका नाम नहीं हैं, बल्कि ये तो मलेरिया विभाग में काम करते हैं और इनकी दया से मच्छरों का कुनबा दिन दुना और रात चौगुना बढ़ रहा है, इस लिए मच्छरों की बिरादरी इन्हें खुब पसंद करती है और इन्हें मलेरिया बाबू कह कर पुकारती है। मलेरिया बाबू को भी मच्छरों से खासा लगाव है। क्योंकि इस दुनिया में मच्छर सबसे अधिक स्वतंत्र प्राणी है। न कहीं आने, न कहीं जाने, न किसी पर बैठने, न किसी को काटने किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं। एकदम स्वतंत्र और बिंदास। मलेरिया बाबू कहते हैं, किसी इंसान से दोस्ती करने से बेहतर मैं मच्छर से दोस्ती करना ज्यादा उचित समझूंगा। इंसान तो फिर भी धोखा दे सकता है किंतु मच्छर कभी धोखा नहीं देगा। खासकर, मुझे तो धोखा इसलिए भी नहीं देगा क्योंकि मुझसे उसे उसका पेट भरने लायक पोषण जो मिलता है। इसी कारण मैं इंसानों से ज्यादा मच्छरों से लगाव रखता हूं। इंसान का इंसान के प्रति डर खत्म हुए बरसों हुए। अब इंसान को भगवान का भी डर न रहा। जिन्हें भगवान का जरा-बहुत डर सताता भी है, तो वे उसे जप-तप के बहाने बहला लेते हैं। और, भगवान मान भी जाता है। समय और बदलते परिवेश के साथ भगवान ने खुद को भी बदल डाला है। मगर, एक प्राणी से इंसान इन दिनों बहुत डरा-सहमा हुआ है। उस प्राणी ने इंसान की नाक में दम कर रखा है। न जागते चैन लेने दे रहा है, न सोते। ऊपर से खरचा तो करवा ही रहा है, साथ-साथ ऊपर का टिकट भी कटवा दे रहा है। दरअसल, यह प्राणी कोई और नहीं एक साधारण-सा मच्छर है, वो भी डेंगू का मच्छर। डेंगू के डर के मारे क्या इंसान, क्या शैतान, क्या अमीर, क्या गरीब, क्या भक्त, क्या संत सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम है। डेंगू के मच्छर के डंक ने ऐसा कहर बरपाया है कि हर रोज दो-चार के निपटने की खबरें आ ही जाती हैं। हालांकि डॉक्टर लोग डेंगू से बचने के उपाय निरंतर बतला रहे हैं लेकिन बचाव फिर भी नहीं हो पा रहा। गंदगी डेंगू के मच्छर को भी पसंद है और हमें भी। तो फिर बचाव हो तो कैसे? अब तो भीड़ में जाते, लोगों से मेल-मुलाकात करते हुए भी डर-सा लगता है। क्या पता डेंगू का डंक कहीं हमला न बोल दे। डेंगू के मच्छर का लार्वा इंसान से भी कहीं ज्यादा ढीठ है। तगड़े से तगड़े कीटनाशक का उस पर कोई असर नहीं होता। चाहे क्वॉइल जला लो या हिट छिड़क लो मगर डेंगू का मच्छर न मरता है न ही दूर भागता। और, कब में आकर डंक मारकर भाग लेता है, यह भी पता नहीं चल पाता। ससुरा डंक भी ऐसा मारता है अगर समय पर डाइग्नोस न हो तो अगला खर्च ही हो ले। कहिए कुछ भी मगर डेंगू के मच्छर ने इंसान की सारी की सारी हेकड़ी निकालकर उसके हाथ में रख दी है। अपने ही घर में डेंगू के मच्छर से ऐसा डरा-डरा घुमता है मानो कोई भूत-प्रेत हो। मजबूरी है, डेंगू के मच्छर को डांट-फटकार भी तो नहीं सकता। मच्छर का क्या भरोसा कब में बुरा मान पीछे से डंक भोंक दे। और, काम तमाम कर जाए। कोशिशें तो खूब की जा रही हैं, डेंगू के डंक से निपटने की पर मुझे नहीं लगता डेंगू से निपटता इत्ता आसान होगा। आखिर पी तो वो इंसान का खून ही रहा है न। अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि इंसान के खून में कित्ता जहर घुला हुआ है। एक साधारण से मच्छर ने इंसान को चारों खाने चित्त कर दिया है। बताइए, इत्ता बड़ा इंसान पिद्दी भरे मच्छर से पनाह मांग रहा है। मच्छारों का दु:शाहस इसलिए बढ़ रहा है कि मलेरिया बाबू को उनका भरपूर समर्थन जो मिल रहा है। सुनने में आया है कि डेंगू के मच्छर की विल-पॉवर इत्ती मजबूत है कि उस पर किसी भी तगड़े से तगड़े कीटनाशक का कोई असर नहीं होता। अब आप समझ सकते हैं कि मच्छर जिस खून को चूसता है, वो कित्ता जहरीला है। शायद इसीलिए इंसान धरती का सबसे जहरीला प्राणी बनने की ओर अग्रसर है। तब ही तो उस पर किसी की वेदना-संवेदना का कोई असर नहीं होता। मुझे बड़ा बुरा-सा लगता है, जब लोग डेंगू के लिए बिचारे मच्छर को दोष देते हैं। इसमें बिचारे मच्छर का क्या दोष? उसे जहां अपना पेट भरने का सामान नजर आएगा, वो वहीं जाएगा न। अब इंसान को काटने से उसका पेट भरता है, तो इसमें गलत ही क्या है पियारे। इंसान से लेकर जानवर तक को अपनी सुविधानुसार अपना पेट भरने का हक है। आपकी तो खैर नहीं जानता लेकिन जब कोई मच्छर मेरा खून चूसने का प्रयास करता है, तो मैं उसे चूसने देता हूं। इस बहाने मेरा गंदा खून कम से कम बाहर तो निकल जाता है। पांच-दस बूंद खून चूस जाने से मैं भला कौन सा दुबला हुआ जा रहा हूं। मच्छर का पेट भरना हमेशा मेरी प्राथमिकता में रहा है। जियो और जीने दो का सिद्धांत मुझे बेहद प्रिय है। मैं तो चाहता हूं, इंसान को डेंगू का डर हमेशा बना रहे। किसी से नहीं डरता, इस बहाने, मच्छर से तो डरेगा ही। डर बहुत जरूर है, चाहे मच्छर का हो या बिच्छू का। डंक लगने के बाद तो डर और भी मारक हो जाता है। फिर बंदा न घर का रह पाता है न घाट का। यह कहावत- देखन में छोटे लागें, घाव करें गंभीर शायद मच्छरों के लिए ही बनाई गई होगी! इसमें कोई शक नहीं मच्छर का काटा सिर्फ बिस्तर और डॉक्टर की पनाह मांगता है। अगर मच्छर डेंगू का हो तो सोने पर सुहागा। इंसान की सारी हेकड़ी मच्छर दो मिनट में निकालकर रख देता है। चाहे कोई कित्ती ही बड़ी तोप क्यों न हो मच्छर के डंक के आगे हर तोप सील जाती है। पता नहीं क्यों लेकिन हां मुझे डरा-सहमा इंसान बहुत अच्छा लगता है। दिल को बहुत तसल्ली-सी मिलती यह देखकर कि इंसान किसी से डरता भी है। वरना तो इंसान अब न शैतान से डरता है न भगवान से। हर डर का तोड़ निकाल लिया है उसने।

काश मैं भी किसी बड़े बाप का बेटा होता

विनोद बक्सरी/ vinod buxari
बचपन में अपने हमउम्र बिगड़ैल रईसजादों को देख कर मुझे उनसे भारी ईष्या होती थी। क्योंकि मेरा ताल्लुक किसी प्रभावशाली नहीं बल्कि प्रभावहीन परिवार से था। मैं गहरी सांस लेते हुए सोचता रहता काश मैं भी किसी बड़े बाप का बेटा होता, या एट लिस्ट किसी नामचीन मामा का भांजा अथवा किसी बड़े चाचा का भतीजा ही होता तो मैं भी ऐसी शरारतें कर पाता। फिर आशावादी दृष्टिकोण मेरे मन को समझाता अभी तो पूरी पिक्चर बाकी है मेरे दोस्त इतना निराश होने की भी जरूरत नहीं है। किसी बड़ी हस्ती का बेटा, भतीजा या भांजा न बन सका तो क्या हुआ क्या पता कल को मेरा रिश्ता किसी बड़े ससुराल से जुड़ जाए। मैं किसी बड़ी हस्ती का दामाद, जीजा या साढ़ू ही बन जाऊं। लिहाजा जिंदगी की लाख जिल्लतें झेलता हुआ मैं अभी ख्याली पुलाव में उलझा हुआ ही था कि धूर्तों की एक टोली मेरे घर शादी का रिश्ता लेकर आ धमकी। मुझे लगा कि शायद किस्मत बदलने का मेरा नंबर आखिरकार आ ही गया। बात लेन-देने की हुई तो मैने कहा कि कम से कम मुझे इतना तो दे ही दीजिए कि गृहस्थी के हल में जुतने लायक साम्थर्य मैं जुटा सकूं। इस पर शातिरों ने हंसते हुए जवाब दिया बच्चे हम न तो दहेज के खिलाफ हैं और न ही हमारे पास पैसों की ही कोई कमी हैज् लेकिन ऐसा है कि हमारे खानदान में शादी में ज्यादा कुछ देने का रिवाज नहीं है। इस पर पलटवार करते हुए मैने कहा ठीक है दहेज नहीं देंगे तो कुछ ऐसा सामान तो दीजिएगा जिससे जिंदगी की गाड़ी आसानी से खींची जा सके । बदले में जवाब मिला कि हमारे यहां शादी में सामान देने को दोष माना जाता है। आखिरकार मेरी अल्पबुद्धि को लगा कि ये लोग दरअसल कान घुमा कर पकडऩा चाहते हैं। बंदे न तो दहेज के खिलाफ हैं और न हीं इनके पास पैसों की कमी है तो फिर प्राब्लम क्या है निश्चय ही इनका इरादा कुछ और है। जो चीजें शादी में दी जाती है हो सकता है उससे कई गुना ज्यादा ये शादी के बाद दें। बस फिर क्या था राजी- खुशी मैं चढ़ गया सूली पर। लेकिन जल्द ही मुझे इस बात का अहसास हो गया कि मैं भयानक चक्रव्यूह में फंस चुका हूं। इसी का साइड इफेक्ट कहें कि भरी जवानी क्या किशोरावस्था में ही मैं बुढ़ापे की गति को प्राप्त होने लगा। अपने देश में अभिजात्य व ताकतवर व र्ग के साथ भी अक्सर यही दोहराने की कोशिश की जाती है। बेचारे कितनी मेहनत से किसी मुकाम पर पहुंचते हैं। लेकिन कभी कहा जाता है कि आम – आदमी के बीच रह कर उनकी परेशानियों को समझने की कोशिश करें तो कभी विशेष नहीं बल्कि साधारण विमान से यात्रा के उपदेश का महाडोज पिलाया जाता है। किसी बड़े नेता को सनक सवार हुई तो झट आदेश जारी कर दिया कि उनकी पार्टी के माननीय गांव-कुचे में जाकर गरीबों के घरों में सिर्फ रुकें ही नहीं बल्कि वहीं जो मिल जाए वही खाकर गुजारा करें। बीच में चलन चला कि सभी बड़े लोग अपना – अपना मोबाइल नंबर सार्वजनिक करें। नतीजा क्या हुआज् । बेचारों को क्या-क्या नहीं झेलना पड़ा। आधी रात को फोन करके लोग गली-कुचों की प्राब्लम नौकरशाहों व राजनेताओं को सुनाने लगे। बड़ी मुश्किल से मोबाइल स्विच आफ, नॉट रिचेबल अथवा नॉट रिस्पांडिंग करके सिरदर्द से छुटकारा मिला। लेकिन अब तो हद ही हो चुकी है कि मामला उनके बाल-बच्चों तक जा पहुंचा है। कहा जा रहा है कि बड़े लोगों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ें। दलीलें पेश की जा रही है कि इससे समाज में समानता कायम होगी। हो सकता है सरकारी स्कूलों की दशा भी सुधर जाए। यह तो सरासर खास को आम बनाने की त्रासदी ही है। साधारण श्रेणी में यात्रा या गरीबों के घरों में कुछ खा-पी लेने तक तो बात ठीक थी, लेकिन यह क्या। अब बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढऩे भेजें। कहां तो गांव-कस्बों में भी लोग बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने से कतराते हैं और अब। हे भगवान। क्या यही दिन देखने के लिए आम से खास बने थे। फिर भी आशावादी दृष्टिकोण रखते हुए ताकतवरों को निश्चिंत रहना चाहिए। आखिरकार साधारण श्रेणी में यात्रा व गरीबों के घर रुकने के सिलसिले का हश्र तो सबको पता ही है।

इनकी प्रतिभा से ही दूर होगी गरीबी

vinod buxari
प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से अपने भाषण में गरीब-गरीबी पर चिंता क्या जता दी, लोग इसकी भी आलोचना पर उतर गए। यह तो हद है। आलोचक कह रहे हैं कि मोदी जी ने अपने भाषण में बयालीस बार गरीब और गरीबी का जिक्र किया। तो इसमें भला क्या बुराई है? क्या वे गरीबों की बात भी न करें? लेना तो पड़ेगा हीं। हमारे देश की यह परंपरा जो बन गई है। आजादी के बाद से ही देश में गरीबी हटाने का अभियान शुरू हो गया। आज अरसठ साल बाद भी हमारे नेता अभिमान से गरीबी हटाने की घोषणा करते शर्माते नहीं हैं। आखिर वे शर्माएं भी क्यों...? भले ही हमारे देश की आधी आबादी मुश्किल से भरपेट खाने का जुगाड़ कर पा रही है, लेकिन जनसंख्या ही नहीं, हम करोड़पति भी सबसे अधिक पैदाकर रहे हैं। हैं न गर्व की बात। सुबह-सुबह आपने देश के इस गौरव पर मैं भी गौरवाविंत हो रहा था कि अचानक मेरी नजर अखबार पर पड़ी। चाय की चुस्कियों के साथ आज का अखबार पढ़ा तो दो परस्पर विरोधाभासी खबरें मानों एक दूसरे को मुंह चिढ़ा रही थी। पहली खबर में एक बड़ा राजनेता अपनी बिरादरी का दुख-दर्द बयां कर रहा था। उसे दुख था कि जनता के लिए रात-दिन खटने वाले राजनेताओं को लोग धूर्त और बेईमान समझते हैं। उनका वेतन , भत्ता या पेंशन आदि बढऩे पर शोर-शराबा शुरू हो जाता है। लेकिन उनके खर्चे नहीं देखे जाते। उनका त्याग-बलिदान नहीं देखा जाता। उक्त राजनेता के अनुसार एक डॉक्टर अपने बेटे को डॉक्टर और वकील बेटे को वकील बनाए तो कोई कुछ नहीं कहता, लेकिन एक राजनेता जब अपने बेटे को इस क्षेत्र में लाना चाहता है तो झट उस पर परिवारवाद का आरोप लगा दिया जाता है। मैं उक्त राजनेता के दुख-दर्द को अभी समझने की कोशिश कर ही रहा था कि नजर दूसरी खबर पर पड़ी। जो एक सब असिस्टेंड इंजीनियर साहब से संबंधित थी। जनाब मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे की नगरपालिका में पदास्थापित हैं। लेकिन कमाल ऐसा कि दुनिया की आंखें चौंधिया जाए। दरअसल निर्दिष्ट शिकायत पर जब उनके मकान में छापेमारी हुई तो रसोई से लेकर टॉयलट तक हर तरफ नोटों के बंडल ही बंडल मिले। श्रीमान पर लक्ष्मीजी की कृपा ऐसी कि उन्हें कमोड तक में नोटों के बंडल छिपा कर रखने पड़े। हैरान-परेशान जांच अधिकारियों की अंगुलियां नोटों को गिनने से जवाब देनी लगी तो नोट गिनने वाली दो मशीनें मंगवाई गई। इससे भी बात नहीं बनी तो कैशियर को बुलाया गया। नोट गिनते-गिनते थक कर निढाल हो चुके जांच अधिकारियों के सामने जब बरामद नोटों को जब्त करने की कार्रवाई शुरू करने की नौबत आई तब भी मुसीबत। नोटों के बंडल लादने के लिए दो ट्रक मंगवाए गए लेकिन वे छोटे पड़ गए। लिहाजा बड़े-बड़े ट्रक मंगवाए गए। कहते हैं कि नोटों के बंडल बांधने के लिए जांच अधिकारियों को किलो भर रस्सी और तकरीबन 15 बोरे भी मंगवाने पड़े। सब असिस्टेंड इंजीनियर साहब की अमीरी के बारे में जो नई जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक घर-मकान का नक्शा पास करवाने के लिए जनाब हर किसी से मोटी रकम घूस के तौर पर लेते थे। यह प्रक्रिया कई सालों तक चलने की वजह से उनके घर पर नोटों का पहाड़ खड़ा हो गया। जिसे देख कर बड़े-बड़े धनकुबेर भी शर्मा जाएं। दरअसल विशाल आबादी वाले अपने देश में डॉक्टर-इंजीनियर का क्रेज तो शुरू से था। बचपन से लेकर आज तक फिल्मों में तरह-तरह के किरदारों को अपने नौनिहालों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने का ख्बाब देखते-सुनते उम्र की इस पड़ाव तक पहुंचा हूं। किसी परीक्षा का रिजल्ट निकलने के बाद जितने भी मेधावी छात्रों की फोटो अखबारों में छपती है उनमें से 99 फीसदी डॉक्टर या इंजीनियर बनने की इच्छा ही जाहिर करते हैं। हालांकि इस क्षेत्र के बारे में अपना इतना ज्ञान बस इतना है कि कार्यालयों में ये अक्सर एक छोटे से केबिन में बैठे नजर आते हैं। लेकिन कमाल ऐसा कि सचमुच घर पर धनवर्षा शुरु हो जाए। अखबार के एक ही पन्ने पर छपी दो अलग-अलग किस्म की खबरें सचमुच हैरान करने वाली थी। बेहद ताकतवर समझा जाने वाला एक राजनेता अपना दुखड़ा रो रहा था तो सरकारी महकमे में सामान्य से कुछ ऊपर पद पर बैठा व्यक्ति नोटों के पहाड़ पर बैठा मिला। इससे भी चोट पहुंचाने वाली बात यह है कि इंजीनियर साहब के घर से बरामदगी की इस घटना के बाद से हर शहर-कस्बे के उनके जैसों के घरों से नोटों बरामदगी की खबरें आनी शुरू हो गई है। क्या करें अपने यहां का चलन ही ऐसा है। लेकिन इंजीनियर साहबों को धैर्य रखने की जरूरत है। यह तो खरबूजा को देख खरबूजा के रंग बदलने वाली बात है। किसी शहर में कोई आतंकवादी वारदात हो जाए तो टेलीविजन से लेकर अखबार के पन्ने तक सुरक्षा कवायद की फोटो व खबरों से रंगे नजर आते हैं। एक अस्पताल में आग लगी और शुरू हो गया अस्पताल दर अस्पताल की सुरक्षा-व्यवस्था खंगालने का सिलसिला। लेकिन कितने दिन कुछ दिन बाद तो। इसलिए दुनिया चाहे कुछ भी कहे, लेकिन अपनी तो सरकार से मांग है कि वे ऐसे लक्ष्मी पुत्रों की प्रतिभा का सदुपयोग जनता की गरीबी दूर करने में करें तो इससे देश-समाज का भला अपने-आप हो जाएगा।